मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

अपनी चीन-नीति की समीक्षा करे भारत

दक्षिण चीन सागर को लेकर भारत व चीन के बीच फिर बयानबाजी शुरू हो गई है। तब हम अपनी चीन-नीति की समीक्षा क्यों नहीं करते?भारत और चीन के बीच फिर बयान-युद्ध छिड़ गया है। हमें यह तो पता ही है कि भारत वियतनाम के साथ मिलकर दक्षिणी चीन सागर में गैस और तेल खोजने की परियोजना पर काम कर रहा है और हमारी यही बात चीन को अखर रही है। इस मुद्दे पर वह हमें आए दिन धमकाता रहता है, यह बात अलग है कि अब हम उससे डरते नहीं हैं और उसकी धमकियों का उसी की भाषा में टका-सा जवाब दे देते हैं। इधर, चीन ने हमें गुरुवार को फिर से धमकाया। उसकी ओर से बयान आया कि भारत ने यदि चीन सागर से तेल निकाला, तो इसका उसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उसे उम्मीद रही होगी कि ज्यों ही वह बड़े खामियाजे की बात करेगा, तो भारत उससे डर जाएगा। मगर, ऐसा नहीं हुआ। शुक्रवार को हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी कह दिया कि दक्षिण चीन सागर किसी की जागीर नहीं है। कृष्णा यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि दक्षिण चीन सागर को मुक्त व्यापार क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए। जाहिर है कि हमारी यह बात चीन को नागवार गुजरेगी, क्योंकि वह तो उसको अपना क्षेत्र ही मानकर चलता है। वह उसका क्षेत्र है नहीं, वह तो वियतनाम का है, पर दादागीरी दिखाना उसका स्वभाव है। हमें इस मुद्दे पर उसके सामने कतई नहीं झुकना चाहिए। यह सही है कि हम झुक नहीं रहे हैं, लेकिन हमारी चीन-नीति अब भी काफी उलझी हुई है। जहां एक तरफ तो हम उससे व्यापारिक रिश्ते प्रगाढ़ करते चले जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ सही यह भी है कि हमारी उससे बिलकुल भी पटरी नहीं बैठती। चीन हमें चारों ओर से घेर रहा है, तो चुप हम भी नहीं बैठे हैं, हम भी उसे घेर रहे हैं। दक्षिण चीन सागर में हमारी मौजूदगी हिंद महासागर में उसकी मौजूदगी का जवाब ही है। हम लुका-छिपी का यह खेल बंद क्यों नहीं करते? हम उससे व्यापारिक संबंध क्यों नहीं तोड़ते? - राजेन्द्र चतुर्वेदी

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