मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

ग्रामीण भारत में बुरा हाल है शिक्षा का




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति ठीक नहीं है। प्रथम नामक संस्था की जो रिपोर्ट अभी चर्चा में है, उसका निष्कर्ष दरअसल यही है।


'प्रथमÓ नामक संस्था की रिपोर्ट एक बार फिर चर्चा में है, पर तय है कि हमारे नीति-निर्माता इस रिपोर्ट को भी गंभीरता से नहीं लेंगे। बहरहाल, प्रथम वह संस्था है, जो देश की शैक्षिक स्थिति को लेकर समय-समय पर व्यवस्था को आईना दिखाती रहती है। यही काम इस संस्था ने एक बार फिर किया है। प्राथमिक शिक्षा की वार्षिक स्थिति पर तैयार 'असरÓ नामक अपनी रिपोर्ट में प्रथम ने बताया है कि ग्रामीण स्कूलों में छात्रों का नामांकन तो बढ़ गया है, मगर जितने बच्चों के नाम रजिस्टरों में लिखे हैं, उतने बच्चे स्कूल आते नहीं हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि वर्ष-2007 में कुल नामांकित बच्चों में से 73.4 फीसदी बच्चे स्कूल आते थे, जबकि वर्ष-2011 में यह प्रतिशत घट गया है। इस वर्ष नामांकित कुल बच्चों में से महज 70.9 प्रतिशत बच्चे ही स्कूल आए थे। यानी, समय के साथ-साथ स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढऩी चाहिए थी, मगर स्थिति यह है कि नामांकन तो बढ़ रहे हैं, जबकि छात्रों की उपस्थिति की दर में गिरावट ही आती चली जा रही है। वहीं, रिपोर्ट में यह तो कहा ही गया है कि तीसरी कक्षा में पढ़ रहे बच्चों को भी अक्षर ज्ञान नहीं है। केवल कागजी खानापूर्ति करने के लिए ही उनको कक्षा-दर-कक्षा पास किया जा रहा है।
मतलब, इस रिपोर्ट की व्याख्या यदि कम शब्दों में करना हो, तो प्रथम के निष्कर्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा का कबाड़ा हो गया है। इधर, स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए मध्यान्ह भोजन योजना जैसे जो टोटके किए गए हैं, उनसे भी देश को कोई फायदा नहीं हुआ है। नुकसान यह हुआ है कि मास्टरों को रसोइया जैसी भूमिका भी निभानी पड़ रही है। हमारे नीति-निर्माता इस रिपोर्ट को गंभीरता से लें, क्योंकि आज के बच्चे कल के भारत के भविष्य हैं और कोई भी देश अपने भविष्य के साथ यूं खिलवाड़ नहीं कर सकता।

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