मंगलवार, 8 मई 2012

अगला राष्ट्रपति और आगामी चुनौतियां

- राजेन्द्र चतुर्वेदी मौजूदा राजनीतिक माहौल इसकी इजाजत नहीं देता कि राष्ट्रपति भवन में रबर की मुहर बैठा दी जाए। तब प्रणबदा का नाम आना राहत देता है। यदि मीडिया में 'प्रणबदा का रास्ता साफÓ अथवा 'दादा जाएंगे रायसीनाÓ जैसे शीर्षकों के सामने विस्मयादि बोधक (!) चिन्ह लगाकर जो खबरें आई हैं, उनको सच मान लिया जाए, तो इससे देश के अगले राष्ट्रपति के संदर्भ में दो बातें साफ होती हैं। एक तो यही कि कांग्रेस किसी भी सूरत में अपने ही उम्मीदवार को देश का अगला राष्ट्रपति बनवाने के लिए कसरत कर रही है, तो दूसरी यह भी कि जो व्यक्ति इस देश का अगला राष्ट्रपति बनेगा, उनका नाम प्रणब मुखर्जी भी हो सकता है। उल्लेखनीय है कि गुरुवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के बीच अगले राष्ट्रपति के विषय पर लंबी बैठक हुई है। इसके बाद ममता ने मीडिया से वही कहा, जो कि सभी दल कहते हैं कि राष्ट्रपति का चयन आम-सहमति से होना चाहिए, पर इस तरह की अटकलों का बाजार भी गर्म हुआ कि एक तरफ तो ममता और सोनिया गांधी के बीच प्रणब मुखर्जी के नाम पर सहमति बन गई है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के ही कुछ नेता नहीं चाहते कि प्रणबदा को रायसीना हिल्स भेजा जाना चाहिए। यह बात अलग है कि हम इन अटकलों के आधार पर कोई भी निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। दरअसल, सच तो तभी हमारे सामने आएगा, जब केंद्र सरकार अपने प्रत्याशी की घोषणा कर देगी। हां, अभी यह जरूर कहा जा सकता है कि प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के एक बेहतर उम्मीदवार हैं। वैसे तो राष्ट्रपति की भूमिका हमारे यहां संवैधानिक प्रमुख के रूप में बहुत ही सीमित है और कुछ विषम राजनीतिक परिस्थितियों में ही राष्ट्रपति के फैसले अहम हो पाते हैं, पर मौजूदा राजनीतिक हालात बता रहे हैं कि वर्ष-2014 में ही देश की राजनीतिक परिस्थितियां थोड़ी और विषम हो सकती हैं। राष्ट्रीय दलों की क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है और दो साल में ऐसा कुछ नहीं होने वाला कि यह निर्भरता घटे। दिलचस्प यह भी है कि दोनों राष्ट्रीय दलों, कांग्रेस व भाजपा के नेता आगामी लोकसभा चुनाव के बारे में कह कुछ भी रहे हों, पर उन्हें अपनी सीमाएं पता हैं। लिहाजा, भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए तो राष्ट्रपति चुनाव में अपना प्रत्याशी भी उतारने नहीं जा रहा है, जबकि इस विषय पर कांग्रेस की बेचैनी भी किसी से छिप नहीं पा रही है। इसका मतलब यह है कि कांग्रेस और भाजपा की स्वीकार्यता उनके ही सहयोगी दलों के बीच घटी है। तब भविष्य के मद्देनजर रायसीना हिल्स में रबर की मुहर नहीं बैठाई जानी चाहिए। प्रणब नहीं, तो प्रणब जैसा ही कोई उचित रहेगा।

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