सोमवार, 21 मई 2012

विदेशी वित्तीय संस्थानों की शरारत तो नहीं ये?


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

रुपया में गिरावट हमारी अर्थव्यवस्था के लिए शुभ नहीं है। कहीं विदेशी वित्तीय संस्थान और निवेशक हमारे साथ शरारत तो नहीं कर रहे?अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय मुद्रा में गिरावट का दौर जारी है और बुधवार को 54.46 रुपए में एक अमेरिकी डालर बिका। याद रहे, रुपए में यह गिरावट उस स्तर से भी ज्यादा है, जिस पर रुपया बीते वर्ष यानी 15 दिसंबर-2011 को पहुंच गया था। गौरतलब है कि उस दिन एक डालर 54.32 रुपए में बिका था। इसके परिणामस्वरूप शेयर बाजार तब भी टूटा था और अब भी टूटा है। बुधवार को मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक 16 हजार अंकों तक आ गिरा। सवाल यह है कि शेयर बाजार व रुपया की इस टूटन को हम किस नजर से देखें? ध्यान रखिए कि हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक रुपया को थामने का अपनी ओर से प्रयास कर चुका है। उसने हाल ही में करीब 50 करोड़ डालर बाजार में उतार दिए थे, पर इसका असर स्थाई नहीं हो सका। तब रुपए में गिरावट के सिलसिले के पीछे कुछ ठोस वजह तो होनी ही चाहिए। क्या इसकी वजह वही है, जो केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद को बताई है? उन्होंने कहा है कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था पर यूरोप की मंदी का असर है। अत: हमारे निर्यात कम हो रहे हैं, विदेशी निवेश भी देश में नहीं आ रहा है, इसीलिए रुपया टूट रहा है। प्रणबदा का अनुमान गलत नहीं होगा, मगर हमें इन सभी तथ्यों को दूसरे नजरिए से भी देखना चाहिए।
इन दिनों यूरोप-अमेरिका का हम पर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश लाने और सब्सिडी खत्म करने का अप्रत्यक्ष दबाव है। तब ये देश विदेशी निवेश को शरारतन भी रोक सकते हैं। उन्हें पता है कि भारत में जब निवेश नहीं जाएगा, तो रुपया कमजोर होगा और इससे घबराकर भारत सरकार जहां एक तरफ तो सब्सिडी खत्म करेगी, तो दूसरी ओर खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश भी खोल देगी। यह आशंका इसलिए है कि हमारे यहां मंदी है नहीं। हां, यह सही है कि कारण चाहे कुछ भी हो, पर रुपया में गिरावट जारी है।


पीएमओ के सुझाव पर फौरन अमल जरूरी


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

विकास परियोजनाओं की जल्दी शुरुआत के लिए पीएमओ ने जो सुझाव दिया, वह बेहतर है। अत: उस पर फौरन अमल भी जरूरी है।
जब सरकार पर यह आरोप लगे कि वह काम नहीं कर रही है, बल्कि सिर्फ चल रही है, तब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) का विचलित होना स्वाभाविक है। यह उसकी चिंता का ही परिणाम है कि उसने पहले से ही फंसी हुईं या फिर नई परियोजनाओं को सही राह पर लाने के लिए एक उपाय सुझाया है। उसका सुझाव है कि उद्योग जगत या परियोजनाएं संचालित करने वालों को जिन भी सरकारी विभागों से काम पड़ता है, उन सभी विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों को मिलाकर एक विशेष-विभाग बना दिया जाए और इस विभाग का काम यह हो कि वह परियोजना के रास्ते में आ रही रुकावटों का फौरन समाधान करे। यह ख्याल उम्दा है। दरअसल, पिछले वर्ष हांगकांग की एक संस्था ने अपने सर्वेक्षण में बताया था कि हमारे देश में किसी भी परियोजना से जुड़ी हुई फाइल तब स्वीकृत होती है, जब वह 58 सरकारी दफ्तरों से होकर गुजर चुकती है। साफ है, इस प्रक्रिया में बहुत समय लगता होगा।
मान लो कि एक दफ्तर में एक ही दिन में काम हो गया, तो भी फाइल स्वीकृत होने में दो महीने से ज्यादा का समय लगता होगा। वह भी तब, जब हम यह भी मान लें कि एक दफ्तर में एक सप्ताह में सिर्फ एक ही अवकाश हुआ। यदि एक फाइल के मंजूर होने में दो महीने का समय भी लगता है, तो यह समय कम नहीं है। यह समय दुनिया के उन 50-55 देशों की तुलना में बहुत ही ज्यादा है, जो इस समय सही रास्ते पर चल रहे हैं। मसलन-जिस काम के होने में हमारे यहां दो महीने से ज्यादा का समय लगता है, उसी प्रकृति का काम ब्रिटेन में छह, अमेरिका में दस और जर्मनी में तीन दिन में हो जाता है और यह हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि यह हांगकांग की उसी एजेंसी ने कहा था, जिसने कहा था कि भारत में किसी भी परियोजना की फाइल 58 दफ्तरों में जाती है।
उल्लेखनीय यह भी है कि अपने यहां दो महीने में काम होता नहीं है, बल्कि हमने यह मान लिया है, यूं ही। सच तो यह है कि हमारे यहां किसी भी काम में वर्षों लगते हैं। फाइल 58 दफ्तरों में जाती है और वहां उसे भृत्य से लेकर बाबू तक व संत्री से लेकर मंत्री तक, कोई भी दबा सकता है। अत: विकास की करीब तीन दर्जन नई परियोजनाएं पिछले चार वर्ष में शुरू नहीं हो सकीं। वहीं, पुरानी भी दर्जनों परियोजनाएं आधी-अधूरी फंसी हुई हैं। लिहाजा, हमारी अर्थव्यवस्था भी पटरी पर नहीं है। ऐसे में पीएमओ द्वारा सुझाया गया उपाय एक बेहतर रास्ता हो सकता है। इस सुझाव पर फौरन अमल होना चाहिए। शुभ काम में देर क्यों?

कैग की रिपोर्ट से झांक रही रेलवे की बदहाली
- राजेन्द्र चतुर्वेदी
कैग की रिपोर्ट के बाद रेलवे को बदहाली से बचाने के प्रयास युद्धस्तर पर होने चाहिए। नहीं तो, इसका हश्र एयर इंडिया जैसा हो जाएगा। रेलवे के संबंध में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की जो रिपोर्ट बीते रोज संसद में पेश हुई, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके बारे में हम भारतीय पहले से न जानते हों। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेल बजट बनाने की प्रक्रिया दोष-पूर्ण है तथा रेलवे की लडख़ड़ाती आर्थिक स्थिति की भारी उपेक्षा की जा रही है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रेलवे का 93 प्रतिशत संचित कोष खर्च हो चुका है और जो बचा है, वह जल्दी खत्म हो जाएगा और तब सरकार को रेलवे को विशेष आर्थिक सहायता देनी पड़ेगी। प्रकारांतर से कैग की रिपोर्ट में आई ये सभी बातें वही हैं, जिनको हम पहले से ही जानते हैं और सरकार तो आम जनता की तुलना में कुछ ज्यादा ही 'चतुरÓ होती है, लिहाजा ऐसा नहीं हो सकता कि वह इन सभी तथ्यों से अपरिचित हो। वह जानती है कि जिस रेलवे को देश के आर्थिक विकास का इंजन बन जाना चाहिए था, वह रेलवे देश पर बोझ बनती चली जा रही है, मगर दिक्कत यह है कि सरकार कर कुछ नहीं सकती। उसके सामने बड़ी चुनौती वर्ष-2014 के आम चुनाव तक चलते रहने की है, इसलिए वह गठबंधन के सहयोगियों के आगे नतमस्तक है।
वरना, और क्या वजह है कि चालू वित्त वर्ष के रेल बजट में किराया बढ़ाने वाले दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा है और उनकी जगह उन मुकुल रॉय को रेल मंत्री बनाया गया है, जो प्रधानमंत्री के निर्देशों की अवहेलना करने के लिए ही जाने जाते हैं। सरकार की यह कमजोरी देश के लिए भी घातक हो सकती है, तब रेलवे तो किस खेत की मूली है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार कैग की रिपोर्ट को जरा गौर से पढ़ेगी और इस पर संसद में जो चर्चा होगी, सो होगी, वह रेलवे को राजनीति का हथियार बनते जाने से बचाने का उपाय भी करेगी। समय रहते ही प्रयास नहीं किए गए, तो रेलवे एयर इंडिया जैसी बन सकती है।

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