शनिवार, 19 मई 2012

भाजपा की मुसीबत बने येद्दियुरप्पा



- राजेन्द्र चतुर्वेदी




येद्दियुरप्पा ने घोषणा कर दी है कि वे भाजपा में बने रहेंगे, मगर इसके बाद भी इस पार्टी की दिक्कतें खत्म नहीं हुई हैं। वह तो यथावत हैं।कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा फिलहाल तो भाजपा में बने रहेंगे, पर इसका यह मतलब कतई नहीं है कि इससे इस पार्टी की दिक्कतें कम हो गई हैं। दरअसल, येद्दियुरप्पा वह हस्ती बन गए हैं, जो भाजपा में रहें या न रहें, पर उसके लिए सदा परेशानी बने रहेंगे। इसलिए कि उनके साथ करीब 70 विधायक हैं और फिर वे कर्नाटक के लिंगायत समुदाय से आते हैं और चूंकि हमारे देश की राजनीति में जातिवाद का खोटा सिक्का खूब चलता है, लिहाजा येद्दियुरप्पा प्रभावशाली राजनीतिज्ञ भी हैं। इतने कि भाजपा उनकी अनदेखी नहीं कर सकती। यह महज संयोग नहीं है कि करीब दस महीने पहले येद्दियुरप्पा जब मुख्यमंत्री के पद से हटाए गए थे, वे तभी से लगातार नाटक कर रहे हैं, इसके बावजूद भाजपा उनके बारे में कोई कठोर निर्णय नहीं ले पा रही है।
यह तो अभी दो दिन पहले की ही बात है, जब येद्दियुरप्पा ने सार्वजनिक रूप से सोनिया गांधी की तारीफों के पुल बांधे थे, तो दूसरी ओर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को नाकारा भी बता दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने पार्टी के प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ई. ईश्वरप्पा पर भी तीखे हमले किए थे। शायद येद्दियुरप्पा अभी यह टटोल रहे हैं कि कांग्रेस में उनके लिए कितनी संभावनाएं हैं, तो यह भी कि भाजपा उनके खिलाफ किस हद तक जा सकती है। यह बात अलग है कि अभी न तो कांग्रेस ने उन्हें कोई भाव दिया है और न ही भाजपा ने भी उनके खिलाफ कार्रवाई करने का मन बनाया है। तब भविष्य में येद्दियुरप्पा कोई इससे भी बड़ी नाटकबाजी कर सकते हैं।
खैर, जहां कांग्रेस की दिक्कत यह है कि चूंकि येद्दियुरप्पा भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते हटाए गए हैं, इसलिए यदि वह उन्हें भाव देगी, तो उसे जवाब देना मुश्किल पड़ जाएगा, क्योंकि यह पार्टी भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों से वैसे भी जूझ रही है। वहीं, भाजपा की दिक्कत तो जगजाहिर है ही। वह दक्षिण भारत के एक -मात्र राज्य कर्नाटक में अपना जनाधार नहीं खोना चाहती। अत: बीएस येद्दियुरप्पा स्वयं को पार्टी से भी बड़ा समझने लगे हैं। इस विश्लेषण में अभी एक तथ्य और जोडऩा पड़ेगा। वह यह है कि भाजपा का वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व आंतरिक मसलों को ठीक से सुलझा नहीं पाता है। तभी येद्दियुरप्पा तो नाटक कर ही रहे हैं, राजस्थान और गुजरात में भी कोई न कोई ड्रामा होता ही रहता है। यानी, उसका मौजूदा संकट राष्ट्रीय नेतृत्व की दिशाहीनता का भी परिचायक है, जिस पर अब आत्म-मंथन होना ही चाहिए।



फास्ट ट्रेक अदालत में चले राजा पर मुकदमा





- राजेन्द्र चतुर्वेदी

टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के मुख्य आरोपी ए. राजा को जमानत मिल गई है। अब उनके मुकदमे की सुनवाई भी जल्दी हो, ताकि न्याय हो सके।सीबीआई की विशेष अदालत ने मंगलवार को टूजी स्पेक्ट्रम महाघोटाले के मुख्य आरोपी देश के पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा को जमानत दे दी है। उल्लेखनीय है कि उनको दो फरवरी-2011 को गिरफ्तार किया गया था। यानी, उनको करीब 15 महीने बाद जमानत मिली है। बहरहाल, आजाद भारत के इतिहास में ए. राजा ऐसे पहले राजनीतिज्ञ हैं, जिनको भ्रष्टाचार के आरोपों में सवा वर्ष का समय जेल में बिताना पड़ा है, मगर इससे देश को संतुष्ट नहीं होना चाहिए। टूजी स्पेक्ट्रम की नीलामी में जो अनियमितताएं हुई थीं, उनसे देश के खजाने को एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा था। जाहिर-सी बात है कि जिसने देश को हजारों करोड़ रुपए की चपत लगाई, यदि वह 15 महीने जेल में रह लेता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसको उसके गुनाह की उचित सजा मिल गई। अलबत्ता, चूंकि हमारी न्यायपालिका दूध का दूध और पानी का पानी करती है। अत: भरोसा किया जाना चाहिए कि राजा अगर दोषी होंगे, तो उन्हें इसकी सजा भी मिलेगी ही।
मगर, यह सवाल जरूर है कि कब? दरअसल, बिहार में हुए चारा घोटाले के आरोप दो दशक बाद अभी तय हो पाए हैं। जब इस मामले में आरोप तय होने में ही दो दशक लग गए, तो समझा जा सकता है कि मुकदमेबाजी में अभी कितना समय लगेगा? इस स्थिति में देश को सरकार से यह मांग करनी चाहिए कि राजा के खिलाफ होने वाली सुनवाई के लिए त्वरित न्यायालय (फास्ट ट्रेक कोर्ट) का गठन किया जाए, ताकि इस मामले का हश्र वैसा न हो, जैसा चारा घोटाला या भ्रष्टाचार के अन्य मामलों का होता रहा है कि एक तरफ मुकदमा चलता रहता है, तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपी राजनीतिज्ञ मौज करते रहते हैं। यानी, राजा के 15 माह तक जेल में रहने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि बस, हो गया न्याय। यह मामला त्वरित न्याय की एक नजीर भी बने।

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