शनिवार, 19 मई 2012

कार्टून प्रसंग को अब समाप्त होना चाहिए

- राजेन्द्र चतुर्वेदी देश में ऐसी कई समस्याएं हैं, जिनका समाधान फौरन होना ही चाहिए। आखिर, हम बाबा साहब के कार्टून वाले प्रसंग में कब तक उलझे रहेंगे? इन दिनों देश में एक विवाद जोरों पर चल रहा है। दरअसल, एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की 11वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की किताब में संविधान के निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का एक कार्टून छापा गया है, जो विवाद का केंद्र बन गया है। बहरहाल, इस कार्टून के लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल देश से माफी मांग चुके हैं। एनसीईआरटी के सलाहकार सुहास पल्शिकर और योगेंद्र यादव अपना-अपना इस्तीफा दे चुके हैं, मगर विवाद फिर भी चालू है। उल्लेखनीय है कि यह कार्टून वर्ष-1949 में देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट शंकर ने बनाया था। यानी, इसको बाबा साहब ने स्वयं देखा होगा, पर तब इस पर कोई विवाद नहीं हुआ था। फिर, यह कार्टून 2006 से एनसीईआरटी की किताब में शामिल है, मगर विवाद 2012 में हुआ है, छह वर्ष बाद। ये सब तथ्य इस ओर तो इशारा करते हैं कि इस कार्टून पर जो विवाद हुआ है, वह राजनीतिक है। यह बात दावे के साथ इसलिए भी कही जा सकती है कि शैक्षिक पाठ्यक्रमों पर ऐसे ही विवाद बीते चार-पांच साल में कई बार हो चुके हैं। मसलन-प्रख्यात रचनाकार प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमिÓ का विरोध इस दलील के साथ हो चुका है कि यह उपन्यास सवर्णवादी मानसिकता को कुछ ज्यादा ही बढ़ावा देता है। जिन्होंने प्रेमचंद को थोड़ा-बहुत भी पढ़ा होगा, वे जानते होंगे कि सवर्णवाद और प्रेमचंद, दो परस्पर विरोधी चीजे हैं। प्रेमचंद सवर्णवादी नहीं, मानवतावादी हैं, पर जिनको रंग -भूमि का विरोध करना था, उन्होंने किया। इसी तरह, रामानुजन के उस लेख का भी विरोध हुआ था, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल था और जिसका शीर्षक था-'थ्री हंड्रेड रामायनाज।Ó विरोधियों को लगा था कि इस लेख में भगवान राम की छवि को धूमिल किया गया है, जबकि ऐसा था, नहीं। बाबा साहब के कार्टून का विरोध भी इन्हीं विरोधों जैसा ही है। इस कार्टून को पाठ्यक्रम में शामिल करने वालों से अलबत्ता यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या इस कार्टून के बिना छात्र राजनीति विज्ञान को समझ नहीं पाते? बाबा साहब के बारे में देश में करोड़ों लोगों ने पढ़ा है, पर जहां पढ़ा, वहां यह कार्टून शामिल नहीं था। यानी, राजनीति विज्ञान की पढ़ाई इस कार्टून के बिना भी हो सकती थी, तब यह छापा क्यों गया? हो सकता है कि इसका भी कोई राजनीतिक कारण हो? जो भी हो, मगर अब यह विवाद खत्म होना चाहिए। इस समस्याग्रस्त देश पर 'दयाÓ करो। बड़े आर्थिक फैसले लेने से बचना हानिकारक रुपया की गिरती कीमत को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक जो कर सकता था, उसने कर दिया है। गेंद अब सरकार के पाले में है। भारतीय रिजर्व बैंक की कोशिशों के बाद डालर के मुकाबले रुपया का मूल्य स्थिर तो हुआ, शनिवार को एक डालर की कीमत 53.54 पैसे पर आकर स्थिर हो गई, मगर हमारी अर्थव्यवस्था के लिहाज से डालर का इतना मूल्य भी सही नहीं है। बेहतर स्थिति यह होगी, जब डालर का मूल्य 40 रुपए के आसपास आ जाएगा, मगर फिलहाल तो ऐसी कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है। खास बात यह है कि रिजर्व बैंक भी रुपया को नियंत्रित रखने के मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। भारतीय रिजर्व बैंक ने निर्यातकों से कहा है कि वे दो सप्ताह के अंदर अपने विदेशी मुद्रा भंडार के पचास फीसदी हिस्से को रुपए में परिवर्तित करें। साथ ही उसने अपने भंडार से भी कुछ डालर बाजार में बेचे हैं। अभी यह तो नहीं कहा जा सकता है कि उसके इन प्रयासों का जितना असर होना था, वह हो चुका है। अभी और भी असर होगा, मगर इससे रुपए की कीमत में वांछित स्थिरता की संभावना कम ही है। दरअसल, रुपया में आ रही गिरावट की मूल वजह यह है कि अब भारत में विदेशी निवेश की आवक कम हो गई है। अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था में सुस्ती के कारण वहां के निवेशक फूंक -फूंककर कदम तो रख ही रहे, साथ ही दुनिया में यह धारणा भी बन गई कि भारत सरकार बड़े आर्थिक फैसले नहीं ले पा रही है। हमारा राजकोषीय घाटा भी निवेशकों को परेशान कर रहा है। तब रास्ता क्या है? यही कि सरकार बड़े आर्थिक फैसले ले। आयातों को कम करने की कोशिश करे, तो निर्यातों को बढ़ाए। जाहिर है कि यह काम रिजर्व बैंक नहीं कर सकता, बल्कि सरकार को ही करना पड़ेगा। मगर, यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है कि सरकार ढर्रे पर चल रही है। साथ ही अन्य राजनीतिक दल संजीदा नहीं हैं। तब भारतीय रिजर्व बैंक रुपया को नियंत्रित करने के लिए क्या कर सकता है? वह जो कर सकता था, उसने कर दिया है।

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