मंगलवार, 8 मई 2012

ऐसे नहीं होगी देश की सुरक्षा चुस्त-दुरुस्त

- राजेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार को आयोजित मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी एनसीटीसी का मसला सुलझ नहीं सका। लगता नहीं कि एनसीटीसी का गठन हो पाएगा।प्रधानमंत्री ने अपनी बात कही और मुख्यमंत्रियों ने अपनी। न तो इन्होंने उनकी सुनी और न ही उन्होंने इनकी और इसी के साथ शनिवार को एनसीटीसी (राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र) जैसे जरूरी मुद्दे पर आयोजित मुख्यमंत्रियों की बैठक खत्म हो गई। इसी के साथ एनसीटीसी के गठन की उम्मीद भी धूमिल पड़ गई। केंद्र के साथ ही साथ सभी राज्य सरकारें भी मानती हैं कि चूंकि देश आतंकवाद और माओवाद से जूझ रहा है, इसलिए केंद्र और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच सामन्जस्य बनाने के लिए एनसीटीसी जैसी एक एजेंसी की जरूरत तो है, पर आश्चर्यजनक यह है कि इसके गठन का कोई रास्ता नहीं निकाला जा सका। इस मामले में निश्चित ही केंद्र सरकार की नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी की गलती है। उसने एनसीटीसी का मसौदा तैयार करने से पहले राज्य सरकारों और विरोधी दलों को तो विश्वास में लिया ही नहीं, उन घटक दलों को भी भरोसे में नहीं लिया, जो कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में शामिल हैं। यह पार्टी शायद भूल गई कि यह गठबंधन सरकारों का दौर है और वह समय गुजर चुका है, जब कांग्रेस कोई भी मसौदा बनाकर उस पर राज्यों के दस्तखत करा लेती थी और राज्य भी चुपचाप दस्तखत कर देते थे। वर्तमान स्थिति तो यह है कि कांग्रेस की सहयोगी ममता भी अपनी ही सरकार का विरोध कर रही हैं। मतलब, कांग्रेस यदि इस युग की हकीकत को जान रही होती, तो एनसीटीसी का मसला भी फंसता नहीं। हां, इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य जो भी कर रहे हैं, वह सब सही ही है। वक्त तो पुरानी बातों को भूलकर आगे बढऩे का था, पर राज्य भी आगे नहीं बढ़े। क्या देश के प्रति राज्य सरकारों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? है, पर पता नहीं हमारे देश के राजनीतिक दल चाहते क्या हैं? जो लोग राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा जैसे मसले को न सुलझा पा रहे हों, उनसे क्या आशा की जाए?

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