शुक्रवार, 11 मई 2012

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में मीन-मेख क्यों?

- राजेन्द्र चतुर्वेदी
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को केजी बालाकृष्णन के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश देने से इंकार कर दिया है। इसमें गलत कुछ भी नहीं।वैसे 'कॉमन काजÓ नामक एनजीओ की याचिका पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष केजी बालाकृष्णन के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है, उसकी यह कहकर आलोचना की जा सकती है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उस तरह की सक्रियता नहीं दिखाई, जैसी वह अन्य मामलों में प्राय: दिखाता है, क्योंकि केजी बालाकृष्णन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जो ठहरे। मगर, बात ऐसी है नहीं। पहले समझ लें कि मामला क्या है? दरअसल, कॉमन काज ने ठोस तथ्यों के आधार पर यह आरोप लगाया था कि वर्ष-2007 से 2010 के बीच जब केजी बालाकृष्णन देश के मुख्य न्यायाधीश थे, तो उनकी व उनके कुछ रिश्तेदारों की संपत्ति में भारी इजाफा हुआ था। यानी, केजी बालाकृष्णन पर आय से अधिक संपत्ति का मामला बनता है। कॉमन काज ने यह आरोप सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लगाया था और मांग की थी कि कोर्ट सरकार को निर्देश दे कि वह केजी बालाकृष्णन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद से हटाने की कार्रवाई प्रारंभ करे। बहरहाल, अदालत ने अपने फैसले में यह तो कहा कि सरकार जांच कराए, साथ ही उसने यह भी कहा कि इस मामले में कोर्ट उसे कोई निर्देश नहीं दे सकता। कुछ लोगों को सुप्रीम कोर्ट की यही बात हजम नहीं हो रही है। इन लोगों का कहना है कि जब भूतपूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त यानी सीवीसी को हटाने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट सरकार को दे सकता है, तो वह ऐसा ही केजी बालाकृष्णन के मामले में क्यों नहीं करना चाहता? क्या इसलिए कि केजी बालाकृष्णन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं? बेशक, इन सवालों में दम तो बहुत है। मगर, इसके बाद भी कोर्ट की मंशा पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। इन दिनों हम अपनी सरकार का यह रवैया तो आमतौर पर देख सकते हैं कि वह कई मामलों में कार्रवाई तभी करती है, जब सुप्रीम कोर्ट उसे फटकार लगाता है। क्या कार्यपालिका को न्याय-पालिका की फटकार का इंतजार करना भी चाहिए? बालाकृष्णन को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बने दो वर्ष हो गए व जिस दिन उन्हें इस पद पर बैठाया गया था, उसी दिन से उनके कथित भ्रष्टाचार के मामले में रोमांचक खबरें आने लगी थीं, तो भी केंद्र सरकार ने कुछ नहीं किया, तो क्यों नहीं किया? क्या उसे सुप्रीम कोर्ट के दखल का इंतजार है? अब कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इंकार करके सरकार को उसका फर्ज ही याद दिलाया है। कोर्ट चाहता है कि ऐसे सभी मामले सरकार ही सुलझाए।

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