सोमवार, 21 मई 2012

निजी क्षेत्रों के भरोसे न रहें, फर्ज निभाएं



- राजेन्द्र चतुर्वेदी




देश में उच्च शिक्षा का प्रसार करना सरकार का काम है, न कि निजी कंपनियों का, मगर मानव संसाधन विकास मंत्री यह बात समझते ही नहीं।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने निजी क्षेत्रों के भरोसे उच्च शिक्षा के प्रचार-प्रसार का सपना एक बार फिर देखा है। वैसे, सिब्बल ने उच्च शिक्षा की सभी कमजोरियों को खुलकर स्वीकार किया, लोकसभा में केंद्रीय शिक्षण संस्थान आरक्षण संशोधन विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते वक्त। उन्होंने बताया कि देश में स्कूल जाते हैं, 22 करोड़ बच्चे, जबकि इनमें से सिर्फ दो करोड़ ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि देश में उच्च शिक्षा की स्थिति कितनी बुरी है? इसके बाद उन्होंने जो आंकड़ा पेश किया, उससे हम यह भी समझ सकते हैं कि इस स्थिति में बहुत जल्दी सुधार होने नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष-2020 तक इस नामांकन दर को मौजूदा 14 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी कर दिया जाए। यानी, सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो वर्ष-2020 तक उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की संख्या लगभग साढ़े चार करोड़ हो जाएगी, मगर वर्ष-2020 आने में अभी आठ साल बाकी हैं। तब यह सवाल तो उठता है कि हम उच्च शिक्षा में शत-प्रतिशत प्रवेश के लक्ष्य को कितने दशकों बाद छू पाएंगे?
मगर, अभी हम इस सवाल को जाने दें। पहले सरकार से यही पूछें कि 2020 तक 30 फीसदी नामांकन का लक्ष्य कैसे हासिल किया जा सकेगा? यह कपिल सिब्बल ने खुद स्वीकार किया कि इस लक्ष्य को पाने के लिए देश में नौ सौ विश्वविद्यालयों व 45 हजार कॉलेजों की जरूरत पड़ेगी। तब आठ वर्ष में इतने शिक्षण संस्थान कहां से आएंगे? फिलहाल तो देश में करीब 570 विश्व-विद्यालय और करीब 15 हजार कॉलेज ही हैं, निजी और सरकारी मिलाकर। यह आजादी के बाद की हमारी कुल उपलब्धि है। तब क्या आने वाले आठ वर्षों में हम नौ सौ विश्वविद्यालय और 45 हजार नए कॉलेज खड़े कर लेंगे? यदि कपिल सिब्बल की मानें, तो इस सवाल का जवाब 'हांÓ है। उनका कहना है कि निजी क्षेत्रों के साथ मिलकर सरकार यह काम कर सकती है। बस, पेच भी यहीं है। क्या एक औसत आम भारतीय नागरिक निजी कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने की हैसियत भी रखता है? जो संस्थान मुनाफा कमाने के लिए खड़े किए जाएंगे, उनसे उच्च शिक्षा के प्रसार-प्रसार की उम्मीद कपिल सिब्बल को क्यों है? जाहिर है कि पूंजीवाद के इस दौर में सिब्बल साहब इन सवालों का जवाब नहीं दे सकते। उन्हें कौन बताए कि शिक्षा का प्रसार करना सरकार का काम है, निजी कंपनियों का नहीं?


शाहरुख पर एमसीए का प्रतिबंध उचित



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

एमसीए ने शाहरुख खान पर पांच वर्ष के लिए रोक लगा दी है। वे अब वानखेड़े स्टेडियम नहीं जा पाएंगे। देखें कि बीसीसीआई क्या करती है?
महाराष्ट्र क्रिकेट ऐसोसिएशन (एमसीए) ने फिल्म अभिनेता शाहरुख खान के वानखेड़े स्टेडियम में घुसने पर पांच वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध के बाद शाहरुख दर्शक की हैसियत से भी पांच वर्ष तक वानखेड़े स्टेडियम में नहीं जा पाएंगे। बहरहाल, यह प्रतिबंध गलत नहीं है। सही है कि शाहरुख न केवल प्रतिष्ठित अभिनेता हैं, बल्कि आईपीएल की एक टीम के मालिक भी हैं, मगर सही यह भी है कि उन्हें अधिकार उतने ही मिले हुए हैं, जितने कि भारतीय संविधान देश के सभी नागरिकों को प्रदान करता है। गड़बड़ तब होती है, जब 'बड़े आदमीÓ स्वयं को एक नागरिक नहीं मानते और वे यूं बर्ताव करते, जैसे कि वे सभी नियम-कानूनों से ऊपर हों। बुधवार की आधी रात वानखेड़े स्टेडियम में शाहरुख खान ने जो किया, चाहे वह एमसीए से जुड़े लोगों के साथ अभद्र व्यवहार हो और चाहे सुरक्षा-कर्मियों से उलझ पडऩा, इसका मतलब यही लगता है कि वे स्वयं को सभी नियम कानूनों से ऊपर मानते हैं। सुनने को तो यह भी मिल रहा है कि शाहरुख ने जिस समय वानखेड़े स्टेडियम में उत्पात मचाया, तब वे शराब के नशे में धुत थे और जो व्यक्ति शराब के नशे में धुत हो, उससे हमें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह प्रवचन सुनाएगा। फिर, शाहरुख पर तो दोहरा नशा रहा होगा, शराब का अलग व स्वयं के विशिष्ट होने का अलग। सो, वे उलझ पड़े।
विडंबना यही तो है कि जिन विशिष्ट लोगों को नियम-कानूनों का सम्मान करके आम लोगों के सामने एक आदर्श पेश करना चाहिए, वह लोग नकारात्मक बातों के कारण ज्यादा चर्चा में आते हैं, जैसे शाहरुख खान। तब कैसे कहा जाए कि एमसीए ने उन पर जो प्रतिबंध लगाया, वह गलत है। गलत तो तब होता, जब एमसीए चुप बैठ जाता। अब देखना यह है कि बीसीसीआई इस मामले में कोई दखल देती है या फिर नहीं?

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