मंगलवार, 8 मई 2012

किसानों का कष्ट कोई नहीं समझना चाहता

- राजेन्द्र चतुर्वेदी
बरेली में किसानों व पुलिस के बीच हुई झड़प की वजह यह है कि हमारा शासन-प्रशासन किसानों के प्रति संवेदनशील नहीं रह गया है।किसान 21 दिन से बरेली (रायसेन) में धरने पर बैठे हुए थे, पर अपने देश में 'परंपराÓ यह है कि आंदोलन अगर अहिंसक हो, वह उन महात्मा गांधी के पग-चिन्हों पर चलकर चलाया जा रहा हो, जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं और मानते हैं कि उन्होंने अहिंसा के सहारे अंग्रेजों को भारत से खदेड़ दिया था, तो आंदोलन करने वालों की कोई नहीं सुनता। अंग्रेज बापू की सुनते थे, मगर हमारे शासन-प्रशासन में बैठे हुए लोग, जो खुद के गांधीवादी होने का दावा भी करते हैं, अपने ही नागरिकों की नहीं सुनते। सोमवार को बरेली में जो फसाद हुआ, उसकी प्रमुख जड़ यही है। किसानों का आंदोलन गलत नहीं था। वे दिन-रात खेतों में पसीना बहाते हैं, तो फसल पैदा होती है। बाजार में उपज के औने-पौने दाम मिलते हैं, इसीलिए तो किसानों की तमन्ना यह भी होती है कि उनकी उपज सरकारी समर्थन मूल्य पर बिक जाए, ताकि उन्हें चार पैसे ज्यादा मिल जाएं। मगर, इधर बारदाना पर राजनीति हो रही है, केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच। जब सभी को अपनी-अपनी राजनीति ही चमकानी है, तो किसानों की सुध भी आखिर कौन लेता? लिहाजा, अन्नदाताओं की सहन-शक्ति भी चुक गई। हम इस पहेली को सुलझाने में न उलझें कि पहले किसान हिंसक हुए होंगे या पहले पुलिस ने उनके साथ गलत व्यवहार किया होगा। तथ्य तो यही है कि पुलिस की गोली से एक किसान की मौत हो चुकी है। इससे पहले एक और किसान की भी संदिग्ध मौत हो चुकी है, जिसके बारे में किसानों का कहना यह है कि उसने आत्महत्या की है, क्योंकि उसका गेहूं बिक नहीं पा रहा था, जबकि प्रशासन का दावा इससे अलग है। जो भी हो, पर इन घटनाओं का सारांश यही है कि प्रदेश में किसान सुखी नहीं हैं। वे बारदाना की राजनीति में फुटबॉल बन गए हैं। राजनीतिक दलों और शासन-प्रशासन को यह कौन समझाए कि ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना सही नहीं?

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