शुक्रवार, 11 मई 2012

भ्रष्टाचारियों की धर-पकड़ ही पर्याप्त नहीं

- राजेन्द्र चतुर्वेदी
प्रदेश में लोकायुक्त के छापे और उनमें करोड़ों की अवैध संपत्ति की बरामदगी अब आए दिन की बात हो गई है। इसका निहितार्थ क्या है?...तो क्या देश के अन्य राज्यों के मुकाबले मध्यप्रदेश में कुछ ज्यादा ही भ्रष्टाचार है या फिर अन्य राज्यों में भ्रष्टाचारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, जबकि मध्यप्रदेश में कार्रवाई हो रही है? इस सवाल का उत्तर ढूंढना आसान नहीं, क्योंकि बातें दोनों ही हो सकती हैं। बहरहाल, लोकायुक्त पुलिस की छापेमारी में स्वास्थ्य विभाग के संचालक डॉ. अमरनाथ मित्तल एक अरब की संपत्ति के मालिक निकले, जबकि जूनियर ऑडिटर गणेश प्रसाद किरार के पास से करीब 25 करोड़ की संपत्ति बरामद हुई है। यह कहानी अब आए दिन की हो चली है, जब लोकायुक्त पुलिस या फिर आयकर विभाग किसी अधिकारी-कर्मचारी के घर छापा मारता है, तो वहां से करोड़ों की दौलत बरामद होती है। इस सूची में भृत्य से लेकर पटवारी और आईएएस से लेकर डीएफओ तक शामिल हैं। होने यह लगा है कि लोकायुक्त या आयकर विभाग जिस भी मटकी पर से ढक्कन उठाता है, उसी में से सांप निकल आता है। क्या यह भ्रष्टाचार राजनीतिज्ञों की मिलीभगत के बिना हो रहा होगा? यह सवाल भी विचारणीय है। यदि इसका उत्तर 'हांÓ है, तो फिर राजनीतिज्ञों के यहां भी छापमारी क्यों नहीं होती? उधर, यदि इस सवाल का उत्तर 'नÓ है, तो फिर सवाल यह भी उठता है कि जब कुछ अधिकारी-कर्मचारी प्रदेश को लूट रहे हैं, गरीब जनता के हक पर दिन-दहाड़े डाका डाल रहे हैं और चूंकि राजनीतिज्ञों को कुछ पता ही नहीं है, तो फिर ये लोग कर क्या रहे हैं? यह सही है कि भ्रष्टाचारी पकड़े जाने लगे हैं, मगर ज्यादा सही यह होता कि भ्रष्टाचार हो ही न पाता। भ्रष्टाचारियों के पकड़े जाने से उन लोगों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, जिनका हक मार लिया जाता है, जबकि भ्रष्टाचार न होना इस बात की गारंटी है कि जनता का हक मारा नहीं जा सकता। सरकार को चाहिए कि वह अब प्रदेश में भ्रष्टाचार-मुक्त वातावरण का निर्माण करे।

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