शुक्रवार, 4 मई 2012

सामने आ गया है रक्षा मंत्रालय का झूठ

- राजेन्द्र चतुर्वेदी जब थलसेना प्रमुख ने कहा था कि सेना के पास हथियार और गोला-बारूद की कमी है, तो याद करें, सरकार ने इसको झुठला ही दिया था।जब थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि हमारी सेना के पास हथियार व गोला-बारूद तक नहीं हैं, तब सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया था। इधर, रक्षा मंत्री एके एंटनी ने जनरल द्वारा बताए गए तथ्यों का खंडन भी किया था और कहा था कि नहीं, ऐसा नहीं है। सेना के पास गोला -बारूद और हथियारों की कोई कमी नहीं है। मगर, अब साफ हो गया कि तब रक्षा मंत्री ने झूठ बोला था और सही वही था, जो कि जनरल ने देश को बताया था। दरअसल, रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में देश की आंखें खोल दी हैं। इस समिति ने वही सब दोहराया है, जो थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने कहा था। यह रिपोर्ट फिलहाल सोमवार को संसद में पेश की जा चुकी है। उस पर वहां चर्चा होगी, पर सरकार संसद में इस मसले पर कहेगी क्या? उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा। हमारी सत्ता की यह आदत आम है कि वह अपनी कमजोरियों को छिपाती ही है, ताकि उससे कोई सवाल न पूछे। सेना के गोला -बारूद वाले मामले में भी यही हुआ, जबकि देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में तो कम से कम ऐसा होना ही नहीं चाहिए। सुरक्षा का मसला बहुत संवेदनशील होता है, किसी भी देश के लिए, पर हमारी सरकार यह समझना ही नहीं चाहती। क्या यह सरकार की घोर लापरवाही का उदाहरण नहीं है कि सेना के पास हथियारों और गोला-बारूद की कमी के बारे में उसे संसदीय समिति को बताना पड़ रहा है? यह सही है कि रक्षा मामलों की संसदीय समिति सेना की खूबियों व खामियों पर नजर रखती है। साथ ही समय-समय पर संसद को इसके बारे में बताती भी है, मगर गोला-बारूद या हथियारों का मसला ऐसा नहीं है, जिसके बारे में संसदीय समिति को सरकार को बताना पड़े। यह मसला थोड़ा-सा अलग है। दरअसल, गोला-बारूद व हथियारों की सेना में वही अहमियत होती है, जो किसी परिवार में आटा और नमक की होती है। गृहिणी को इसकी जानकारी होनी ही चाहिए कि उसके पास नमक है या नहीं। ठीक इसी प्रकार रक्षा मंत्रालय को भी इसकी जानकारी होनी ही चाहिए कि सेना के पास हथियार और गोला-बारूद हैं या नहीं। सवाल यह है कि यदि रक्षा मंत्रालय को इसकी जानकारी थी, तो रक्षा मंत्री ने सेना प्रमुख द्वारा बताए गए तथ्यों को झुठलाया क्यों था और यदि उन्हें जानकारी नहीं थी, तो क्यों नहीं थी? आखिर, रक्षा मंत्रालय किस मर्ज की दवा है? यह तो इस देश की सुरक्षा से खिलवाड़ है, जिसकी इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। महंगाई और बेरोजगारी का पूंजीवाद से रिश्ता अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दुनिया में रोजगार के मौके महंगाई व आबादी के अनुपात में पैदा नहीं हो रहे। सच भी यही है।अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस की पूर्व-संध्या यानी 30 अप्रैल को आई अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट पूंजीवाद के वकीलों के लिए किसी झटके से कम नहीं है। बशर्ते, वह चल रही आर्थिक नीतियों का खोट देखने को तैयार हों। इस रिपोर्ट का सारांश यह है कि दुनिया में महंगाई बढ़ रही है, विश्व की आबादी भी तेजी से बढ़ती चली जा रही है, मगर आबादी और महंगाई के अनुपात में रोजगार के अवसरों में वृद्धि नहीं हो रही है। इस रिपोर्ट में भारत के बारे में भी चर्चा है। इसमें कहा गया है कि वर्ष-2004 से लेकर वर्ष-2010 तक भारत में सिर्फ 0.1 फीसदी रोजगार बढ़े। यह वो अवधि भी है, जब हमने अपने सत्ताधीशों के मुंह से कई बार यह सुना कि देश में रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। यदि हम वित्त वर्ष -2011-12 यानी पिछले वर्ष का केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और सभी राज्यों का बजट भाषण ही पढ़ लें, तो इन भाषणों के अनुसार देश में गुजरे वित्त वर्ष में साढ़े पांच करोड़ से भी ज्यादा रोजगार के नए अवसरों का सृजन हो चुका होना चाहिए, पर क्या वास्तव में ऐसा हुआ? इस सवाल का जवाब 'नÓ ही है। दरअसल, पूंजीवाद सबको रोजगार की गारंटी कभी नहीं देता। यह बात और है कि इसका जिक्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी अपनी रिपोर्ट में नहीं किया, क्योंकि यह संगठन भी अब पूंजीवादी हो चला है। मगर, सच यह भी है कि उसने इशारों ही इशारों में पूंजीवाद को कठघरे में भी खड़ा किया है। श्रम संगठन ने रोजगार के अवसर न बढऩे की वजह यह बताई है कि पूंजी कुछ चुनिंदा लोगों के पास एकत्रित हो रही है, जिसको वे मंदी के डर से खर्च नहीं कर रहे हैं, इसीलिए रोजगार के अवसर नहीं बढ़ रहे हैं। जो भी हो, भारत को इस रिपोर्ट से सबक लेना चाहिए। हम पूंजीवाद के रास्ते पर इतनी दूर निकल गए हैं कि वहां से समाजवाद की ओर वापसी संभव नहीं, तो भी इसे मानवीय तो बनाना ही होगा।

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