गुरुवार, 21 जून 2012

भारत में कोई भी दल सच्चा धर्मनिरपेक्ष नहीं



- राजेन्द्र चतुर्वेदी




सरसंघ चालक मोहन भागवत ने जो सवाल पूछे हैं, उनके जवाब मिलने ही चाहिए, पर धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले नेताओं के पास जवाब है कहां?बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधे जाने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कुछ ज्वलंत सवाल उठाए हैं और उन सवालों को टाला नहीं जा सकता। गौरतलब है कि नीतिश कुमार ने कहा था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार अभी से घोषित कर देना चाहिए व याद यह भी रखा जाना चाहिए कि वह 'सेक्युलरÓ हो। इसी पर मोहन भागवत ने पूछा कि सेक्युलर की परिभाषा आखिर है क्या? हमारे देश के सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले लोग जिस चीज से सबसे ज्यादा डरते हैं, वह धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा ही है। इसकी वजह यही है कि हमारे देश में कोई भी राजनीतिक दल सेक्युलर है ही नहीं। यदि भाजपा हिंदुत्ववादी है, तो जो उसको कदम-कदम पर सांप्रदायिक ठहराते हैं, वे दल अल्पसंख्यकवादी हैं। जैसे-केरल में कांग्रेस वामपंथियों के खिलाफ जिस गठबंधन का नेतृत्व कर रही है, उसमें मुस्लिम लीग भी शामिल है। उस दल को क्या सच्चा धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है, जो मुस्लिम लीग के साथ गलबहियां करने में संकोच नहीं करता? वामपंथी भी तो बहुत बड़े धर्मनिरपेक्ष बने फिरते हैं, पर क्या इन्होंने एक विदेशी लेखिका को कोलकाता से खदेड़ नहीं दिया था, सांप्रदायिक तत्वों के दबाव में? तब, जब पश्चिम बंगाल में इनकी सरकार थी।
ये दो तो उदाहरण दिए गए, सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की यही कहानी है। जेडीयू को गुजरात के दंगे याद आ रहे हैं, पर वह भागलपुर को याद नहीं करना चाहती।1984 के सिख विरोधी दंगों को भी कौन सेक्युलर याद करता है और कौन कश्मीर से खदेड़े गए हिंदुओं के जख्मों पर मरहम लगाने जाता है। ऐसे में मोहन भागवत ने जो सवाल उठाए हैं, उनके जवाब मिलने ही चाहिए। मगर, धर्मनिरपेक्षों में क्या यह नैतिक बल है भी?

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