शुक्रवार, 22 जून 2012

धधक रहे मंत्रालय की आग से उठे सवाल



- राजेन्द्र चतुर्वेदी





महाराष्ट्र के मंत्रालय में अग्निकांड की घटना से कई सवाल खड़े हो गए हैं। यह बात और है कि हमारी व्यवस्था उनके जवाब देगी नहीं।महाराष्ट्र सरकार के मंत्रालय में गुरुवार को न केवल आग लगी, बल्कि वह इतनी भीषण भी हो उठी थी कि उस पर 12 घंटे में काबू पाया जा सका और खैर मंत्रालय की चार मंजिलें तो जल ही गईं, खबर तीन लोगों की मौत की भी है। बहरहाल, अब आग तो बुझ गई है, लेकिन यह अग्निकांड अपने पीछे ऐसे कई सवाल छोड़ गया है, जो लंबे समय तक सुलगते रहेंगे और फिलहाल तो वे सवाल न केवल धधक रहे हैं, बल्कि महाराष्ट्र की सरकार को झुलसा भी रहे हैं। एक मंत्री ने बहुत 'मासूमियतÓ से कहा कि हम क्या कर सकते हैं, दमकल एक घंटे की देरी से मंत्रालय पहुंची। सवाल यह है कि जब दमकल की गाडिय़ां एक घंटे की देरी से पहुंचीं, मंत्रालय जैसी जगह पर, जहां सरकार 'विराजतीÓ है, तब आग यदि मुंबई के किसी दूसरे इलाके में लगे, तो वहां दमकल कितनी देर में पहुंचेगी? सवाल तो यह भी है कि घटनास्थलों पर दमकल को सही समय पर पहुंचाने की व्यवस्था करने का जिम्मा किसका होता है? सरकार का या किसी और 'हस्तीÓ का?
पूछा यह भी जाए कि मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण इमारत में आग को बुझाने के क्या पुख्ता इंतजाम नहीं होने चाहिए? यदि इंतजाम थे, तो प्राय: पूरा मंत्रालय स्वाहा कैसे हो गया और यदि बंदोबस्त नहीं थे, तो जवाब कौन देगा कि क्यों नहीं थे? कुल मिलाकर यह पूरा वाकया व्यवस्था की अक्षमता और आपराधिक लापरवाही का उदाहरण है। यदि उस भवन में आग लग जाए, जहां से एक राज्य को चलाने की व्यवस्था बनाई जाती है और 'महानÓ व्यवस्थापक रोते दिखें कि क्या करें, दमकम समय पर नहीं आई या दलील दें कि जांच के बाद पता चलेगा कि आग कैसे लगी, तो देश इतना नादान नहीं कि वह व्यवस्था की खामियों को न समझे।
देश जानता है कि यहां जांच का मतलब क्या होता है? अपने देश में अनंतकाल तक चलने वाली जांचों के अलावा और होता भी क्या है? ये निकम्मे करेंगे भी क्या, जो अपने दफ्तर को आग से बचाने के इंतजाम नहीं कर सके और आग पर समय पर काबू भी नहीं पा सके? कभी-कभी यह भी लगता है कि यह अग्निकांड एक साजिश हो सकता है। वरना, शॉर्ट सर्किट से शुरू होने वाली आग को विकराल होने से पहले रोका जा सकता था। दरअसल, मंत्रालय कोई पेट्रोल का गोदाम तो था नहीं कि इधर चिंगारी उठी व उधर आग भड़क गई। आग तो धीरे-धीरे ही विकराल हुई होगी। जो भी हो, मगर इतना पक्का है कि हम जिस व्यवस्था के भरोसे बैठे हैं, वह किसी मतलब की नहीं। वह बोझ बन गई है, बोझ...।

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