बुधवार, 27 जून 2012

सरबजीत, पाक और हमारे समाचार चैनल



- राजेन्द्र चतुर्वेदी



कहा तो यही जा रहा है कि जरदारी ने सरबजीत विषयक निर्णय अपनी फौज के दबाव में बदला है, मगर यह तथ्यों का सरलीकरण करना है।...और सरबजीत सिंह रिहा नहीं हो सका। मंगलवार की शाम करीब साढ़े छह बजे पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी के प्रवक्ता फरहतुल्ला बाबर यह ऐलान कर चुके थे कि राष्ट्रपति ने सरबजीत की फांसी की सजा माफ करके उम्र कैद में बदल दी है और यह भी कि राष्ट्रपति ने कानून मंत्रालय को निर्देश दिया है कि यदि सरबजीत उम्र कैद की सजा भुगत चुका है, तो उसे अब रिहा कर दिया जाए। इसके करीब आधा-पौन घंटे बाद इधर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जरदारी की 'जय-जयकारÓ करने लगा, तो उधर पाकिस्तान में मोर्चा संभाला हामिद मीर जैसे पत्रकारों ने, जो सरबजीत को 'इंडियन कसाबÓ कहते हैं। यानी, हमारे लिए जितना बड़ा गुनहगार 26/11 के हमलों के बाद पकड़ा गया पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब है, पाकिस्तानी मीडिया का एक बड़ा वर्ग अपने लिए उतना ही बड़ा गुनहगार सरबजीत को मानता है।


फिर, पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी का भी बयान आया। उन्होंने कहा कि सरबजीत की बहन को मैं अपनी बहन मानता हूं और मैंने उससे वादा किया था कि सरबजीत को बचाऊंगा। मुझे खुशी है कि मैं अपना वादा निभाने में सफल रहा। इसके बाद सरबजीत के घर जश्न मनाया जाने लगा, मगर रात करीब एक बजे सरबजीत के परिवार की खुशियों को ग्रहण लग गया। बाबर, वही बाबर, जो शाम को सरबजीत की सजा माफ करने का ऐलान कर रहे थे, रात को कह रहे थे कि कोई 'कन्फ्यूजनÓ हुआ है। राष्ट्रपति ने सरबजीत की सजा नहीं माफ की, बल्कि उस सुरजीत सिंह को रिहा करने की घोषणा की है, जो वर्ष-1989 से पाकिस्तान की जेल में बंद है। साफ है कि पाकिस्तान सरबजीत की सजा को माफ करने की अपनी घोषणा से पलट चुका था। क्यों पलटा, इस सवाल पर अब गंभीरता-पूर्वक विचार होना चाहिए? कुछ लोग कह रहे हैं कि जरदारी ने अपना निर्णय फौज व आईएसआई के दबाव में पलटा है, मगर यह तथ्य का सरलीकरण करना है। सरबजीत की रिहाई जैसा निर्णय फौज को 'भरोसेÓ में लिए बिना पाकिस्तानी राष्ट्रपति ले ही नहीं सकते थे। यानी, निर्णय सभी ने मिलकर नहीं लिया होगा, यह बात पचती नहीं।


तब क्या हुआ कि पाकिस्तान बदल गया? दरअसल, इस वक्त 26/11 का एक प्रमुख सूत्रधार अबु हमजा हमारी गिरफ्त में है। वह पाकिस्तान के खिलाफ हमारे पास एक पुख्ता सबूत है। पाक देखना चाहता होगा कि हमजा कि गिरफ्तारी से भारत में जो तूफान उठा है, क्या सरबजीत की रिहाई से उस तूफान को शांत किया जा सकता है? क्या भारतीयों का ध्यान हमजा से हटाकर सरबजीत की ओर मोड़ा जा सकता है? और पाकिस्तान तक यह संदेश चार -पांच घंटे में ही पहुंच गया था कि नहीं, यह नहीं हो सकता। अत: उसने पलटी मार दी। किसने दिया, उसको यह संदेश? बेशक, हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने। मंगलवार के प्राइम टाइम में मीडिया में चर्चा इसी सवाल के इर्द-गिर्द चल रही थी कि सरबजीत की रिहाई हमजा के मामले पर क्या असर डालेगी व क्या नहीं? क्या जरूरत थी, इस प्रश्न को उठाने की? एक रणनीति के तहत ही यदि मीडिया सरबजीत प्रकरण पर पाकिस्तान सरकार की तारीफ करता और हमजा को भूल जाता, तो लगता है कि पाक भी सरबजीत को छोड़ देता, क्योंकि तब उस तक संदेश यह जाता कि हमजा की ओर से ध्यान हटाने की उसकी रणनीति कामयाब हो गई है। यह सही है कि पाक सरबजीत को यदि रिहा भी कर देता, तो भी वह 26/11 के दोष से बचता नहीं, फिर भी मीडिया को इस मुद्दे पर चुप ही रहना था।
हमजा का मामला बहुत संवेदनशील है। यह पता अब चल रहा है कि भारत व अमेरिका मिलकर आठ-नौ महीने से कोशिश कर रहे थे, तब सउदी अरब ने उसको हमें सौंपा। यह भी इसकी संवेदनशीलता का ही उदाहरण है कि हमारी सरकार अब भी नहीं कह रही है कि वह सउदी अरब से लाया गया है, तो भी मीडिया ने उस मामले को सरबजीत से जोड़ दिया। यह सही है कि मीडिया यदि ऐसा नहीं करता, तो भी सरबजीत की रिहाई की कोई गारंटी नहीं थी, पर सही यह भी है कि मीडिया ने गंभीरता नहीं दिखाई।

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