मंगलवार, 12 जून 2012

सुप्रीम कोर्ट ने दी बहुत शानदार व्यवस्था



- राजेन्द्र चतुर्वेदी





दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ऐसे मामलों में दोषियों को उम्रकैद की सजा हो।दहेज के लिए हत्या के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही शानदार व्यवस्था दी है। यूं कहें कि जो काम विधायिका को करना चाहिए था, वह काम न्यायपालिका ने किया है। बहरहाल, उच्चतम न्यायालय ने इस व्यवस्था में कहा है कि दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराधों के दोषियों को उम्रकैद की सजा तो कम से कम होनी ही चाहिए। दरअसल, दहेज उत्पीडऩ के सभी प्रकरण आईपीसी की धारा-304 बी के तहत पंजीकृत होते हैं। इस दफा के तहत दोष साबित होने पर, चाहे दहेज के लिए हत्या ही क्यों न कर दी गई हो, सजा प्राय: सात वर्ष की ही मिलती है। यह इस दफा के तहत मिलने वाली न्यूनतम सजा है। वैसे, इसमें अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है। मगर, अब तो सुप्रीम कोर्ट ने अधिकतम सजा को ही न्यूनतम सजा में तब्दील कर दिया है, नई व्यवस्था देकर। इस अपराध में सजा बढ़ाने का कार्य कायदे से तो संसद को करना चाहिए था, मगर किया न्यायपालिक ने है।
जो भी हो, पर एक बेहतर काम हुआ। दहेज के लिए हत्या के अन्य मामलों में अब सुप्रीम कोर्ट की यह व्यवस्था नजीर की तरह पेश की जाएगी और तब दहेज लोभी अपने किए गुनाह की उचित सजा भी पा सकेंगे। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है, वह मामला उत्तराखंड के रुड़की का था, जहां दहेज लोभी पति ने छोटे भाई और मां के साथ मिलकर अपनी पत्नी को इसलिए जलाकर मार डाला था, क्योंकि वह अपने पीहर से टीवी व कूलर नहीं ला रही थी। 17 फरवरी-1996 को घटी यह घटना जब अदालत में पहुंची, तो निचली अदालत ने तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। सजा बहुत ज्यादा है व इसमें कानून का पालन नहीं हुआ है-जैसी दलीलें लेकर अभियुक्त उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने वहां हत्या को हादसा सिद्ध करने की कोशिश भी की थी कि जब बहू खाना बना रही थी, तब स्टोव फटा और वह जल मरी।
मगर, हाईकोर्ट ने उनकी सभी दलीलें खारिज कर दीं तथा उस फैसले को बरकरार रखा, जो निचली अदालत द्वारा दिया गया था। इसके बाद इन्हीं दलीलों के साथ यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया और जहां न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की बेंच ने मामले के सभी पहलुओं को बहुत बारीकी से देखा और बाद में न्यायमूर्ति-द्वय इस नतीजे पर पहुंचे कि गुनहगारों को कम से कम उम्रकैद की सजा तो मिलनी ही चाहिए। यानी, अभियुक्तों को जो सजा निचली अदालत ने दी थी और जिस पर हाईकोर्ट ने मुहर लगाई, वही सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी। यह निर्णय उम्दा है।

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