शनिवार, 21 जुलाई 2012

शरद पवार की मांग गलत व अतार्किक



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

यदि शरद पवार केंद्र सरकार में नंबर-दो वाली हैसियत चाहते हैं, तो उनकी यह मांग अतार्किक है। कांग्रेस को भी यह मांग माननी नहीं चाहिए।कांग्रेस और एनसीपी में रार चल रही है। क्यों चल रही है? इस सवाल का सही जवाब किसी के पास नहीं। जब कुछ सवालों के सीधे जवाब नहीं मिलते, तो हमारा मीडिया कल्पना करने लगता है और सच यह भी है कि ऐसे मौके बहुत कम आते हैं, जब मीडिया की कोई कल्पना झूठी साबित हुई हो। तब इस कलह के पीछे भी मीडिया की जो परिकल्पना है, वह भी सच ही होगी।


बताया यह जा रहा है कि कांग्रेस और एनसीपी में ये जो दंगल हो रहा है, जो कि शुक्रवार को सोनिया गांधी और शरद पवार की मुलाकात के बाद भी नहीं सुलझा, उसका कारण यह है कि पवार अपने लिए वो वाली कुर्सी मांग रहे हैं, जो प्रणब मुखर्जी ने छोड़ी है। मतलब, केंद्र सरकार में प्रणबदा की हैसियत प्रधानमंत्री के बाद दूसरे नंबर की हुआ करती थी। पवार चाहते हैं कि यह रुतबा अब उन्हें मिले, जबकि कांग्रेस पवार की यह मंशा पूरी करने को तैयार नहीं।
हो भी क्यों? शरद पवार कांग्रेस के नेता नहीं हैं, एनसीपी के नेता हैं। फिर, उनके पास फुर्सत भी कहां है? वे अपने उद्योग-धंधे चलाएंगे या क्रिकेट की राजनीति करेंगे या सरकार में वह भूमिका निभाएंगे, जो कि प्रणबदा निभाया करते थे? फिर, कहां प्रणब की पाक-साफ और जुझारू छवि व कहां शरद पवार, विवाद जिनका पीछा ही नहीं छोड़ते। पवार की मांग पर सोनिया गांधी सहानुभूति-पूर्वक थोड़ा-बहुत विचार करतीं भी, मगर उन्हें याद होगा व होना ही चाहिए कि यह वही शरद पवार हैं, जो कभी उन्हें विदेशी मूल का बताकर कांग्रेस से अलग हो गए थे और अपनी अलग पार्टी बना ली थी। शरद पवार के दिमाग में भी यह बात आई ही कैसे कि वे मांग करेंगे और सोनिया गांधी उनकी मांग मान लेंगी तथा उनको प्रणबदा वाली कुर्सी पर बैठा देंगी? सच तो यह है कि पवार के पास यह मांग करने का उचित आधार ही नहीं है।
फिर भी मांग की जा रही है, तो इसीलिए कि पवार गठबंधन सरकार की मजबूरियां जानते हैं, पर कांग्रेस को इस मुद्दे पर नहीं झुकना चाहिए। नंबर-दो की हैसियत उसी को मिलनी चाहिए, जो कि कांग्रेस का हो, बाहरी को नहीं। आखिर, सरकार का नेतृत्व भी तो कांग्रेस ही कर रही है। इसके लिए जहां उसके पास एके एंटनी हैं ही, तो राहुल गांधी भी नई जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हो गए हैं, अब। कमलनाथ, चिदंबरम आदि करीब एक दर्जन नेता तो कांग्रेस में ऐसे हैं ही, जो प्रणबदा वाली भूमिका को ठीक से निभा सकते हैं। तब इसको लेकर विवाद अनुचित है। तब तो और भी अनुचित, जब विवाद शरद पवार जैसे गैर कांग्रेसी कर रहे हों।

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