सोमवार, 16 जुलाई 2012

जनता ने दिखा दिया है अखिलेश को आईना



- राजेन्द्र चतुर्वेदी



उत्तरप्रदेश के नगर निकाय चुनावों के परिणाम समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी ही हैं। इस पार्टी का जनाधार कम होने लगा है, अब।उत्तरप्रदेश के नगर निकाय चुनावों में यदि भाजपा को बढ़त मिली है, उसने 12 में से नौ नगर निगम यदि जीत लिए हैं, तो इस जीत का एक अर्थ तो यही है कि उत्तरप्रदेश के शहरों में भाजपा का जनाधार अब भी है और अगर इसे ठीक से सहेजकर रखा जाए, तो यह वर्ष-2014 के लोकसभा चुनाव में भी काम आ सकता है, मगर इसका एक दूसरा अर्थ भी है। चूंकि हाल ही में पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई समाजवादी पार्टी इस चुनाव में ढेर हो गई है, वह केवल दो नगर निगमों पर ही परचम लहरा पाई है, इसलिए इसका मतलब यह भी है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जादू अब उतर गया है। भाजपा अपनी इस जीत को किस रूप में लेती है, वह जीत का जश्न मनाती है अथवा अपने जनाधार को विस्तार देने की कोई रणनीति बनाती है, यह तो उसी पर निर्भर है, मगर समाजवादी पार्टी के सामने वह मौका आ गया है, जब उसे आत्म-विश्लेषण कर ही लेना चाहिए। उत्तरप्रदेश में भाजपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, मगर समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव में ठीक प्रदर्शन नहीं कर पाई, तो हाथ ही मलती रह जाएगी। तब अखिलेश कुछ सवालों पर विचार करें?
जैसे-उन्होंने अपने विधानसभा चुनाव अभियान में जनता से वादा किया था कि उनकी सरकार यदि आई, तो कानून-व्यवस्था से किसी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। क्या यह काम वे कर पाए हैं? क्या प्रदेश में अपराधों का ग्राफ बढ़ नहीं गया है और क्या सपा से जुड़े लोग शासन-प्रशासन को ठीक से काम करन दे रहे हैं? क्या अखिलेश के वादे के मुताबिक उत्तरप्रदेश की जनता भयमुक्त हो गई है? इन और इन जैसे दर्जनों सवालों का जवाब जाहिर है कि 'नहींÓ में ही मिलता है। यही तो कारण है कि नगर निकाय चुनाव में जनता ने खतरे की घंटी बजा दी है। देखना है कि समाजवादी पार्टी यह आवाज सुनती भी है या नहीं?

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