मंगलवार, 31 जुलाई 2012

अपना आधार व्यापक नहीं बना पाए अन्ना




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

इस बार टीम अन्ना के आंदोलन को वैसा जन- समर्थन नहीं मिलता लग रहा, जैसा पिछले वर्ष मिला था। इसके कारणों की पड़ताल जरूरी है।टीम अन्ना के तीन प्रमुख सदस्य जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे हुए हैं और अन्ना हजारे ने भी घोषणा कर दी है कि सरकार ने यदि उनकी तीनों मांगें नहीं मानी, तो 29 जुलाई से वे भी अनशन में शामिल हो जाएंगे। ये तीन मांगें हैं:-सांसदों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों की सुनवाई के लिए त्वरित अदालतों (फास्ट ट्रेक कोर्ट) का गठन, ताकतवर लोकपाल कानून और केंद्र सरकार के 15 मंत्रियों पर टीम अन्ना द्वारा भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए गए हैं, उनकी जांच स्वतंत्र निकाय (एसआईटी) से कराना। बेशक, ये तीनों मांगें जायज हैं, पर लग यह रहा है कि इस बार इस आंदोलन को वैसा जन-समर्थन नहीं मिल रहा है, जैसा तब मिला था, जब बीते वर्ष अगस्त के महीने में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे। आखिर, ऐसा क्यों हो रहा है?
दरअसल, पिछले एक वर्ष में ऐसा बहुत कुछ हुआ है, जिसका संदेश यह निकलकर सामने आया कि टीम अन्ना भी वैसी ही है, जैसे कि हमारे राजनीतिक दल। दलों में नेता लोग एक-दूसरे को पटखनी देने का खेल खेलते ही हैं, तो यही खेल टीम अन्ना में भी होता रहा है। राजेंद्र सिंह व राजगोपाल पीवी जैसे लोग टीम अन्ना से अलग हुए और यह आरोप लगाकर कि अरविंद केजरीवाल का अहंकार बहुत बढ़ गया है। समय-समय पर यह खबरें भी आती ही रहीं कि टीम अन्ना के किस सदस्य की किससे पटरी नहीं बैठती है। अन्ना पहले बाबा रामदेव से दूरी बनाकर चलते थे, बाद में वे उनके करीब पहुंच गए। इसे वैसा ही अवसरवाद माना गया, जैसा कि राजनीतिक दलों, राजनीतिज्ञों में अकसर देखा जाता है।
दलितों का एक वर्ग मानकर चलता रहा है कि यह आंदोलन दलित विरोधी है। कुछ अल्पसंख्यक भी इस आंदोलन को अपना विरोधी मानते हैं, पर टीम अन्ना द्वारा उनको समझाने का कहीं भी प्रयास होता नहीं दिखा। देश में छोटे-छोटे कई आंदोलन चल रहे हैं, उनको अपने साथ लाने का प्रयास भी कहीं नहीं हुआ। सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी आंदोलन को जन-समर्थन उसके वैचारिक आधार पर ही मिलता है। यानी, कोई भी आंदोलन सबसे पहले व्यक्तियों के दिमाग में आकार लेता है, सड़कों पर तो वह बाद में आता है। क्या टीम अन्ना ने अपने आंदोलन को वैचारिक आधार देने की कोशिश की? नहीं। कुल मिलाकर आंदोलनकारी न तो अपना आधार व्यापक बना पाए और न ही यह संदेश दे पाए कि वे राजनीतिज्ञों जैसे नहीं हैं। इसका नतीजा हमारे सामने है और भूलों को सुधारा नहीं गया, तो यह आंदोलन भी खत्म ही मानो।

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