मंगलवार, 3 जुलाई 2012

मुठभेड़ की न्यायिक जांच से न कतराएं




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

यह संभव है कि छत्तीसगढ़ में हाल ही में सुरक्षा बलों व माओवादियों में जो मुठभेड़ हुई थी, उस पर राजनीति हो रही हो, तो भी जांच जरूरी है।लो, अब उस मुठभेड़ पर भी सवाल उठने लगे हैं, जो पिछले सप्ताह छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ और माओवादियों के बीच हुई थी और दावा किया गया था कि उसमें बीस माओवादी मारे गए हैं। इस मुठभेड़ को लेकर छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार तो गद्गद थी ही, केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी इसे माओवाद-विरोधी अभियान की एक बड़ी सफलता बताया था। उन्होंने कहा था कि इस मुठभेड़ में तीन बड़े माओवादी सरगना मारे गए हैं, पर इस पर जिसने सबसे पहले सवाल उठाए, वह सज्जन भी कांग्रेस के ही एक नेता और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। उनका नाम है, चरणदास महंत। ताजा समाचार यह है कि अब छत्तीसगढ़ कांग्रेस एक स्वर में कह रही है कि मुठभेड़ फर्जी है और वह उसकी न्यायिक जांच की मांग भी करने लगी है। इतना ही नहीं, प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने बस्तर के कांग्रेसी विधायक कवासी लकमा के नेतृत्व में एक दल भी बांसागुड़ा भेजा है। उधर, ग्रामीण तो कह ही रहे हैं कि मुठभेड़ पूरी तरह से फर्जी है। गांव वालों का कहना है कि सुरक्षा बलों ने उनकी शांतिपूर्ण सामुदायिक सभा पर बिना किसी पूर्व चेतावनी के गोलियां चलानी शुरू कर दीं, इससे बीस लोग मारे गए।
यह सही है कि न तो ग्रामीणों के बयान पर आंखें बंद करके यकीन किया जा सकता है, न ही यह भी माना जा सकता है कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस इस मुठभेड़ के बहाने राज्य सरकार को घेरने के प्रयास नहीं कर रही होगी। दरअसल, अपने देश में माओवाद पर भी राजनीति होती है। जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार माओवादियों का दमन करती थी, तो ममता बनर्जी रोती थीं कि हाय! निर्दोष मारे जा रहे हैं, पर ज्यों ही बंगाल की सत्ता ममता के हाथ आई, माओवादी उन्हें शैतान लगने लगे। संभव है कि ऐसी ही राजनीति छत्तीसगढ़ में हो रही हो, तो भी घटना की जांच तो होनी चाहिए, क्योंकि अपने देश में फर्जी मुठभेड़ें भी होती हैं।

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