गुरुवार, 26 जुलाई 2012

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बाघों को संरक्षण देगा



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

सुप्रीम कोर्ट ने बाघ अभयारण्यों के कोर जोन में पर्यटन पर अंतरिम रोक लगा दी है। उसका यह निर्णय बाघ संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है।उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को बाघों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। एक आरटीआई कार्यकर्ता ने जनहित याचिका दायर करके कोर्ट से मांग की थी कि बाघ अभयारण्यों के अंदरूनी इलाकों (कोर जोन) में पर्यटन की गतिविधियां बंद कराई जाएं, क्योंकि इससे बाघों की गतिविधियां प्रभावित होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी याचिका पर सुनवाई करने के बाद बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन पर रोक लगा दी है। यह सही है कि यह रोक अंतिम नहीं है। अदालत इस मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचेगी, पर फिलहाल तो बाघ अभयारण्यों में पर्यटन पर रोक लग गई है। अदालत ने उन राज्यों को, जहां बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्र बनाए गए हैं, यह भी निर्देश दिया है कि वह तीन हफ्तों में अभयारण्यों के आसपास बफर जोन भी तय कर दें और अगर यह काम नहीं हुआ, तो फिर संबंधित राज्यों के वन विभाग के प्रमुख सचिव पर पचास हजार का जुर्माना लगाया जाएगा। साथ ही इस निर्देश का पालन न करने वाले राज्यों पर अदालत की अवमानना का मुकदमा भी चलेगा। उल्लेखनीय है कि बाघ अभयारण्यों के आसपास बफर जोन तय करने का निर्देश कुछ राज्यों को हमारी सर्वोच्च अदालत पहले भी दे चुकी है, पर उसके निर्देश को राज्यों ने एक कान से सुना और दूसरे से उड़ा भी दिया था। मंगलवार को ऐसे सभी राज्यों पर कोर्ट ने दस-दस हजार का जुर्माना भी लगाया, जो कि उचित है।
दरअसल, बफर जोन उस इलाके को कहा जाता है, जो बाघों के घूमने की जगह (कोर जोन) के चारों तरफ होता है और जहां वह जानवर होते हैं, बाघ जिनका शिकार करके अपना पेट भरते हैं। यानी, अभयारण्य तो है, पर उसका बफर जोन यदि नहीं है, तो वह किस मतलब का? ऐसे अभयारण्यों में बाघ खाएंगे क्या? ऐसे में कोर्ट के इस निर्णय की जितनी सराहना की जाए, कम ही है।

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