मंगलवार, 3 जुलाई 2012

आस्था को तवज्जो देना सही रहेगा




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

सेतु समुद्रम परियोजना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी, तो उससे हमें व्यापारिक लाभ भी नहीं मिलना है, तब रामसेतु आखिर तोड़ा क्यों जाए?सेतु समुद्रम परियोजना अब एक बार फिर चर्चा में है। वैसे तो रामसेतु को काटकर समुद्री मार्ग बनाने की इस परियोजना पर काम होना चाहिए या नहीं, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है। सोमवार को पर्यावरणविद् आरके पचौरी के नेतृत्व में बनी समिति की रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में पेश हो गई है, जिसमें कहा गया है कि यदि समुद्री मार्ग बनाना है, तो रामसेतु को तोडऩे के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। फिलहाल तो कोर्ट ने मामला आठ हफ्तों के लिए टाल दिया है और संभव है कि इसके बाद वह इस मसले पर कोई फैसला देगा। तथ्य यह भी है कि जब यह मसला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है ही, तो वह कभी न कभी इस पर निर्णय भी देगा, जो कि रामसेतु को तोडऩे का हो सकता है, तो नहीं तोडऩे का भी। मगर, बेहतर यह हो कि सरकार इस मसले पर खुद विचार करे और व्यापारिक हितों को नहीं, बल्कि आस्था को ही तवज्जो दे। दरअसल, माना यह जाता है कि भगवान राम ने यह पुल तब बनाया था, जब उन्होंने लंका पर चढ़ाई की थी, माता सीता को रावण से मुक्त कराने के लिए। कोई जरूरी नहीं कि यह मान्यता सही हो, तो भी सेतु आस्था का प्रतीक तो है ही।


फिर, इसका टूटना पर्यावरण की दृष्टि से भी ठीक नहीं है, तब सरकार इस परियोजना से अपने कदम वापस क्यों नहीं खींचती? यह सही है कि यदि सेतु समुद्रम परियोजना पूरी हो गई, तो फिर समुद्री जहाजों को श्रीलंका का चक्कर नहीं काटना होगा, वे भारत और श्रीलंका के बीच से ही निकल जाया करेंगे, इससे समय और ईंधन की बचत होती, मगर किसकी? हमारे पूरब की ओर जाने वाले जहाज कोलकाता से, तो पश्चिम की ओर जाने वाले जहाज मुंबई या कांदला से रवाना होते हैं। यानी, इस परियोजना से हमें कोई व्यापारिक फायदा भी नहीं है। तब हमारी सरकार दूसरे देशों को फायदा देने के लिए आस्था से खिलवाड़ क्यों कर रही है?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें