शनिवार, 27 अप्रैल 2013

एक मां की प्रार्थना




कविता

कितनी खुश थी मैं,
अपनी भावी ख़ुशी को लेकर।
कितने नाम सोचे थे मैंने,
अपने अजन्मे बच्चे के।
लड़का होगा तो ये नाम रखूंगी,
लड़की पर ये नाम खूब फबेगा।
पर ...एक ही  क्षण में,
काफूर हो गई खुशियां मेरी।
अखबार की बर्बर सुर्खियों ने,
छीन ली मुझसे मेरी वो ख़ुशी,
जो अब तलक पूरी पाई भी न थी।
किस किस्म का दरिंदा है,
 आज का  इंसान।
कैसे कहूं इंसान उसे,
इस कदर हैवानियत, दरिंदगी
पाश्विकता...
नहीं ये तो पशु भी नहीं...
ईश्वर गर तेरी बनी दुनिया में,
यही हश्र है बेटियों का।
तो अब कन्या भ्रूण हत्या की,
नई परिभाषा लिखी जाएगी।
पहले दहेज दानव से बचने को,
मारी जाती थी बेटियां।
अब इज्जत के हवाले संहारी जाएंगी,
और हां भगवन्-
 पुरुष मानसिकता,
गर यूं तब्दील होगी हैवानियत में।
तो कौन मां पूत चाहेगी?
हे तारनहार...
गर मेरी बिटिया पर-                                        
उठनी हो एक भी वीभत्स निगाह
तो कृपा करना...
मुझे बिटिया न देना। 
और जो मेरा पूत डाले,
ऐसी घिनौनी निगाह किसी बेटी पर,
तो भगवान मुझे बेटा भी न देना। 
मुझे बांझ ही रखना भगवन्
मुझे बांझ ही रखना...


- पूजा भाटिया प्रीत, इंदौर

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