शनिवार, 17 अगस्त 2013

आखिरकार, मेरा कसूर क्या है : राघवजी



जेल में 36 दिन काटकर लौटे पूर्व वित्त मंत्री राघवजी ने रोते हुए कहा

राघवजी से वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भारद्वाज की बातचीत


भोपाल। चार इमली के बी-19 बंगले की 36 दिन बाद उदासी टूटी है। राघवजी भाई सांखला जेल से घर लौट आए हैं। 14 अगस्त को बी-19 में 70 कारों का काफिला देखा। राघवजी कहते हैं - मैं तो सोचता था जेल के बाहर चार लोग भी लेने नहीं आएंगे। पर बाहर 400 लोग खड़े थे। मेरी इज्जत तार-तार थी। पर देख कर लगा कि मुझे इज्जत देने वाले अभी हैं। 14 की दोपहर जब वे जेल से लौटे तो पैरों में साधारण चप्पल थी। सफेद रंग का पायजामा और क्रीम कलर का गंदा सा कुर्ता। वे जिस कमरे में, जिस कुर्सी पर बैठे थे, उसके ठीक ऊपर भेड़ाघाट के जलप्रपात का फोटो लगा था। राघवजी शायद ये नहीं सोच पाए कि राजनीति भी जलप्रपात की तरह होती है। झरने, ऊपर से नीचे की तरफ ही बहा करते हैं। बंगले पर मौजूद 250-300 समर्थकों में केसरिया पेठा बांटा जा रहा था। पर शायद ही किसी ने मुंह मीठा किया हो। ट्रे में चाय के गिलास थे। बिस्कुट थे। पर लौट रहे थे। राघवजी की बेटी ज्योति सबको कुशलक्षेम दे रही थीं। पत्नी हीरा बेन अंदर के कमरे में बैठी थीं। दो दिन बाद यानी शुक्रवार को पिता-पुत्री की आंख में जैसे बाढ़ आ गई थी। ज्योति ने कहा- हम गले तक भर चुके हैं। टूट चुके हैं। ब्लैकमेलिंग की राजनीति के शिकार हुए हैं। इधर, राघवजी भी फबक रहे थे-सरकार ने अच्छा नहीं किया। वो मीसाबंदी के 19 महीने अच्छे थे। ये 36 दिन तो दुख और अंधेरे से भरे थे। मेरा कसूर आखिर क्या था? मैंने तो कभी शिवराज जी से प्रतिस्पर्धा नहीं की। सीएम बनने की कभी कोई महत्वाकांक्षा नहीं पाली। साधना सिंह के विदिशा से लडऩे की बात आई तो मैंने खुद चुनाव लडऩे से मना कर दिया था। जब उमा भारती हटीं तो लोगों ने कहा कि सीएम के लिए मेरी प्रबल दावेदारी है। पर मैंने कहा कि मैं परफॉर्म नहीं कर पाऊंगा। बाद में उमा भारती ने भी मुझसे कहा था कि उन्होंने मेरा नाम आगे न बढ़ाकर गलती की थी। राघवजी बार-बार भर आती आंखों को पोंछते हुए सवाल करते हैं- मेरे साथ दो और आरोपी बनाए गए थे। पर मुझे 36 घंटे में गिरफ्तार कर लिया पर उनको 36 दिन बाद भी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई। आखिरकार, मेरा कसूर क्या है?


इस्तीफे वाले दिन और जेल जाने तक की क्या कहानी है?
 सुबह शिवराज जी का फोन आया था। वे कह रहे थे कि पुलिस में एक शिकायत हुई है। हमारा और पार्टी का मानना है कि आप इस्तीफा दे दें। मैंने बिना कोई सवाल किए। एक कोरे कागज पर तीन लाइनें लिखीं। और फैक्स करवा दिया। थोड़ी देर बाद तोमर जी का फोन आया। उन्होंने कहा कि हमारा भी मत है कि आप इस्तीफा दे दें। इसके बाद मैं अपने जन्मदिन के कार्यक्रमों में व्यस्त हो गया। मैं विदिशा चला गया। वहीं पत्रकारों ने बताया कि मेरा निलंबन नहीं निष्कासन हो गया है। मैं हैरान था। ये कैसा सुलूक?

गिरफ्तारी के पहले क्या हुआ?
 एक एप्लीकेशन थाने में जमा होती है। एफआईआर होती है। और फिर ताबड़तोड़ गिरफ्तारी के लिए कोशिशें शुरू हो जाती हैं। मैं विदिशा से वापस आया। मेरी पत्नी भी आईं। मैं अपने दोस्त के घर खाना खाने गया। फिर कोहेफिजा के फ्लैट पर गया। मेरी पत्नी को मंदिर में जाप करना था। उसने जाप किया और मेरे पास आ गईं। दूसरी रात 1 बजे पुलिस ने मेरे फ्लैट के दरवाजे पर ताला जड़ दिया। हम दरवाजा लगातार खटखटाते रहे। पर आसपास इतनी दहशत थी कि किसी ने हमारी आवाज नहीं सुनी। बाहर लगभग 400 पुलिस वाले थे। पूरी छावनी बनाई हुई थी। पुलिस कहती है कि मेरी लोकेशन जबलपुर थी। पर मैं जबलपुर गया ही नहीं। यदि मैं फ्लैट पर ताला लगाता तो चाबी मेरे पास होती। चाबी मेरे पास आती कैसे? दूसरे दिन सुबह 1 बजे पुलिस ने मेरे फ्लैट का ताला तोड़ा और कहा थाने चलना है। मुझे गाड़ी में ऐसे घेर कर बैठाया गया जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं। भाग जाऊंगा। मैं भूखा था। फ्लैट पर हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था। मुझे ले जाने से पहले मेरी भांजी के फ्लैट में घुसकर सारे ताले तोड़े गए। उनको धमकाया गया कि उठा ले जाएंगे। 3 दिन के भीतर मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। ये तब हुआ जब सीडी की जांच रिपोर्ट नहीं आई। जांच रिपोर्ट तो अब तक नहीं आई। बावजूद, मुझे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। थाने में भी मेरे साथ कोई भद्रता नहीं की गई। मैंने थाने में किसी को नहीं धमकाया। किसी को नहीं कहा कि देख लूंगा?

गिरफ्तारी से पहले तोमर से कोई बात हुई?

हां, शाम को बात हुई थी। उन्होंने कहा था कि हम आपको बचा लेंगे। आपकी मदद करेंगे। पर मैंने कहा था कि मुझे नहीं लगता कि सरकार मुझे बचाएगी। क्योंकि, मैंने फोन पर ही उनसे आशंका जताई कि शासन का व्यवहार सहानुभूति के विपरीत है। लगता नहीं है कि ये व्यवहार उस शख्स से किया जा रहा है जो 10 साल तक प्रदेश का वित्तमंत्री रहा है।

यानी आप सीधे-सीधे टारगेट किए गए?
हां, ये कुछ भी हो सकता है। कोई पैसे का खेल, या फिर कोई राजनीतिक षडयंत्र का खेल। पर जिस ढ़ंग से हुआ, वह ढ़ंग ठीक नहीं है। कैलाश जोशी जी को मैंने बताया था। उन्होंने कहा था कि पार्टी एक्शन लेना चाहती है। सरकार का निर्णय है। मैंने कहा कि पार्टी की ही सरकार है। पार्टी ही सोचे। मेरा मामला पहले अनुशासन समिति को भेजा जाए। जांच हो फिर निलंबन हो। और निष्कासन हो। सीधे निष्कासन तो पार्टी संविधान के खिलाफ है। मैं इससे सहमत नहीं हूं। जोशी जी ने कहा कि मैं बात करता हूं। पर उनका फोन नहीं आया।

जेल में भी क्या आप से बुरा बर्ताव किया गया?

हां, मेरे समर्थकों को बड़ी मुश्किल से मुझसे मिलने दिया गया। मैं जिसके नाम को हां कह देता था, उसको भेजा नहीं जाता था। मैं जेल अफसरों को अपनी सेहत के बारे में नोट कराता था पर किसी ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। मुझे एक बार हमीदिया और दो बार भोपाल मेमोरियल ले जाया गया। पर दोनों ही जगह गंभीरता से चेकअप नहीं हुआ। मुझे पहले से ही बीपी की शिकायत थी। शुगर 279 पर पहुंच गई थी। बैरक में मुझे चक्कर आने लगे थे। दिन में तीन-तीन बार चक्कर आते थे। एक बार मैं सोने वाले चबूतरे पर गिर भी गया था। मुझे लगा कि मेरी पसली टूट गई है। पर ऐसा नहीं हुआ। लेकिन मेरे पैरों में सूजन आ गई थी। ये किडनी से रिलेटेड प्रॉब्लम थी। किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब जेल से आकर सारी जांचें करवा रहा हूं।

फिर ये 36 दिन कैसे गुजारे?
 मैंने अपने को कंपोज कर लिया था। किससे बात करता। अपने सुख-दुख किसे बताता। वहां कोई मेरा अपना नहीं था। शुरू के दो दिनों में रात भर नहीं सो पाया। फिर सोचा ऐसा रहा तो मर जाऊंगा। मैंने सुबह योग शुरू किया। पूजा शुरू की। पढऩा शुरू किया। वीर सावरकर को पढ़ा। जसवंत सिंह की जिन्ना पर किताब को पढ़ा। प्रेमचंद की कहानियां पढ़ीं। वृंदावन लाल वर्मा का उपन्यास कचनार पढ़ा। पहले बैरक में टीवी नहीं था। फिर टीवी आया। उसमें सिर्फ दूरदर्शन ही आता था। शुरू में मुझे मेरी छपी खबरों को काट कर अखबार दिए गए । पर तीन दिन बाद साबुत अखबार आने लगे। मैंने जो पढ़ा उसकी नोटिंग एक डायरी में की है। पर यह जेल डायरी नहीं है। मेरा वजन 4-5 किलो कम हो गया है।

जेल से लौटने के बाद सरकार की तरफ से किसी ने बात की? कोई मिलने आया?

गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता को मैंने ही फोन किया था। वे खुद मिलने बंगले पर आ गए। उन्होंने भी पुलिस कार्रवाई को सही नहीं बताया। मैंने उनसे कोई शिकायत नहीं की। मैंने तोमर से समय लेने की कोशिश की। कैलाश विजयवर्गीय को भी फोन लगाया। पर वे मुंबई में हैं। मुख्यमंत्री से कोई बात नहीं हुई। वे बुलाएंगे। तो चला जाऊंगा। अपनी तरफ से कोई बात नहीं करूंगा। जो कहना होगा। पार्टी के सामने कहूंगा। विदिशा के लोग मेरे साथ हैं। उन्होंने मुझे नैतिक बल दिया है। वे आरोपों से प्रभावित नहीं हैं। गिरफ्तारी के बाद मैंने कहा था कि पहले मेरा इरादा चुनाव लडऩे का नहीं था। पर यदि पार्टी चाहेगी तो अब मैं चुनाव जरूर लड़ंूगा। मैं मतदाताओं से भी क्लीन चिट लेना चाहूंगा।

लेकिन पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो ? किसी और पार्टी में जाएंगे? क्या पार्टी से बगावत करेंगे?
 नहीं, यह मैं सोच भी नहीं सकता। 55 साल से पार्टी की सेवा कर रहा हूं। पार्टी को जमाने में मेरा भी थोड़ा-बहुत योगदान है। फैसला पार्टी को करना है। जब पार्टी फैसला करेगी तो मैं अगला कदम उठाऊंगा।

पार्टी ने तो विजय शाह को भी माफ कर दिया है?
ये फैसला पार्टी को करना है।
चुनाव नजदीक हैं। पार्टी यदि गलत फैसले करती है तो क्या उसे नुकसान उठाना पड़ेगा?
यदि गलत लोगों पर दांव लगाया जाएगा तो उसके दुष्परिणाम तो भुगतने ही पड़ेंगे। मैं जो भी फैसला करता हूं अपने साथियों के परामर्श के बाद ही करता हूं।

आपको अटल जी और आड़वाणी जी पसंद करते हैं, कहीं इस कारण से तो आप टारगेट नहीं किए गए?
मुझे नहीं मालूम। वित्तमंत्री रहते कॉरपोरेट लॉबी मुझसे नाखुश थी। मेरे विरोध के कारण ही जीएसटी लागू नहीं हो पाया। फिर कुछ लोग मेरी सीट पर भी निगाह गड़ाए बैठे थे। कुछ लोग वित्तमंत्री भी बनना चाहते थे। हो सकता है वही लोग इस साजिश के पीछे हों।

क्या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की भी कोई भूमिका देखते हैं?
शिवराज जी जब 16 वर्ष के थे। तब मुझे जेल में मिले थे। मैंने उनको आगे बढ़ाने के लिए जो हो सकता था किया। मैंने सोचा टेलेंट है। एक समाज से लड़का आ रहा है। इसे आगे बढ़ाओ। मैंने ही उनसे कहा था कि बुधनी से लड़ो। मैंने ही उनको टिकट दिलवाने में मदद की। मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। मंै शिवराज जी के लिए कोई चुनौती नहीं हूं। मैंने खुद होकर न कोई टिकट मांगा और न कोई क्षेत्र। सीहोर की बात आई तो मुझे शमशाबाद भेजा गया। शमशाबाद की बात आई तो मुझे विदिशा भेजा गया। राज्यसभा भी मैं ठाकरे जी के कहने पर गया। पार्टी के सामने मैंने अपनी कोई इच्छा नहीं रखी। आज भी कोई इच्छा नहीं है। पर दुख इस बात का है कि पार्टी ने मुझे सामान्य कार्यकर्ता की हैसियत बरकरार नहीं रखने दी। सरकार ने मेरी जमानत तक का विरोध किया। मेरे साथ जो दो प्रभावहीन आरोपी बनाए गए थे, उनको अब तक छोड़ा हुआ है। जिसने मुझ पर आरोप लगाया। वह मेरे पास तीन साल से था। तीन साल तक वो क्यों खामोश रहा। मेरे बंगले से 2 महीने पहले ही गया। 2 महीने तक चुप रहने के लिए उसने किसने रोका था? मुझे इसी बात का दुख है। न सरकार ने अच्छा किया  और न पार्टी ने?

आप गुजरात के कच्छी समाज से आते हैं। क्या नरेंद्र मोदी के सामने भी अपना पक्ष रखेंगे?

नहीं, इसकी जरूरत नहीं है। हां, मेरी गिरफ्तारी के बाद कच्छ के सांसद और विधायक जरूर सक्रिय हुए थे। उन्होंने मेरे प्रति संवेदना जताई थी। मैं तो सिर्फ तोमर जी के सामने अपना पक्ष रखूंगा। मिलने का समय मांग रहा हूं। समय देंगे तो पार्टी कार्यालय जाऊंगा। मैं अभी किसी भी सार्वजनिक समारोह में शिरकत नहीं कर रहा हूं। विदिशा में कार्यकर्ता स्वागत करने वाले थे। पर मैंने मना किया। पहले पार्टी का फैसला आ जाए। तो कुछ किया जाए।

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